Sunday, July 21, 2013

एक झलक सी ही...

क्यों न तुम आकर, ज़रा मुस्करा कर फिर चले जाना
बस  एक पल ही सही, एक पल के लिए सिर्फ आ जाना
क्यों न तुम आकर, एक झलक दिखला कर फिर चले जाना
बस दो पल के लिए ही, एक बार हमें याद तोह कर लेना

इस अस्मंजश में हैं हम, की करे भी तोह क्या करे
कभी भूल जाना भी करे, पर इस यादों में हैं आ उलझे
इस मुशकिल में आ ठेहरे, की मन तोह बहुत कुछ करे
माना हैं कभी कहाँ नहीं मैंने, पर इस चुप्पी को कभी सुना तोह करो

इंतज़ार और इंतज़ार, बहुत करवाया हैं इस समय ने
पर अब तुम आ भी जाओ, एक पल के लिए ही
पर अब तुम यूँ न तड़पाओ, अब उस एक झलक सी ही के लिए